पूरी दुनिया में क्रिकेट को चाहने वाले हैं. क्रिकेट को एक उत्सव के रूप में देखा जाता है.
दुनिया
भर में रहने वाले भारतीय क्रिकेट के इस त्योहार का जश्न मनाने के लिए मैच
देखने पहुंचते हैं. कई लोग मैच देखने के लिए महीनों पहले से तैयारियां शुरू कर देते हैं. ऐसे ही कुछ लोगों से बीबीसी ने बात की. विश्व कप के मैच देखने इंग्लैंड पहुंचे मुबंई के अभंग नायक बताते हैं, "विश्व कप एक त्योहार है. इसे कैसे मिस किया जा सकता है? हमलोग हमेशा इस त्योहार के लिए पैसे बचाने की योजना बनाते हैं. चार साल पहले हम ऑस्ट्रेलिया गए थे और अब ब्रिटेन आए हैं. क्रिकेट के लिए कुछ भी कर सकते हैं."
ये कहते हुए अभंग की आंखों में ऐसी चमक थी जो एक क्रिकेट प्रेमी की आंखों में ही देखी जा सकती है.
अभंग ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है और अमरीका में रहते हैं. यहां इनका ख़ुद का बिज़नेस है. अभी वो अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ कैलिफ़ोर्निया में रहते हैं.
क्रिकेट के लिए अपने प्यार को बयां करते हुए अभंग कहते हैं, "मैं 25 साल पहले अमरीका आया था. इसके बाद मैंने यहां शादी की. मेरे बच्चे भी यहीं पैदा हुए. हमारे रहन-सहन के साथ-साथ कई चीज़े बदल गईं, लेकिन क्रिकेट के लिए हमारी दीवानगी में कोई बदलाव नहीं आया. ये हमें हमेशा भारत के साथ जोड़ता रहा है."
वो बताते हैं, "अमरीका में बास्केट बॉल और फुटबॉल से लोग प्यार करते हैं. मेरे बच्चे भी ये खेल खेलते हैं. लेकिन क्रिकेट के लिए हमारा जो जुनून है वो ख़त्म नहीं हुआ है."
अभंग के परिवार में क्रिकेट को लेकर इतना उत्साह और प्रेम उन्हीं से शुरू हुआ था. इसके बाद उनकी पत्नी पद्मजा भी क्रिकेट में दिलचस्पी लेने लगीं. अब इनके बच्चे क्रिकेट के इस जुनून को आगे ले जा रहे हैं.
एक घटना को याद करते हुए पद्मजा बताती हैं, "चार साल पहले हम लोग 2015 विश्व कप के लिए ऑस्ट्रेलिया गए थे. उस दौरान मेरे बच्चों ने क्रिकेट के लिए दो हफ़्ते तक अपना स्कूल छोड़ दिया था. ये तो और रहना चाहते थे लेकिन मैंने ही ज़ोर डाला कि ज़्यादा क्लासेज़ नहीं मिस करनी हैं."
पद्मजा गर्व के साथ बताती हैं, "मेरे बच्चे सॉकर और टेनिस जैसे खेल भी खेलते हैं, लेकिन क्रिकेट से उन्हें बहुत प्यार है. अमरीका का समय भारत से काफ़ी अलग है. जब भारत में मैच होते हैं तो मेरे बच्चे अपने स्कूल के व्यस्त दिनचर्या में भी मैच मिस नहीं करते हैं."
वो बताती हैं, "क्रिकेट के लिए ऐसा जुनून मुझे मेरे पति और बच्चों से ही मिला है."
अभंग के बड़े बेटे शुभांकर बताते हैं कि वो किस तरह अपने ग़ैर-भारतीय दोस्तों तक इस खेल को पहुंचा रहे हैं.
"जब हम पहले टेक्सस में थे तो वहां क्रिकेट क्लब में क्रिकेट खेला करते थे. लेकिन कैलिफ़ोर्निया आने के बाद हमें पता चला कि यहां कोई क्रिकेट क्लब ही नहीं है तो हमने अपना ही क्रिकेट क्लब शुरू किया जहां हम अपने दोस्तों को क्रिकेट सिखाते हैं. अब मेरे दोस्त भी क्रिकेट को लेकर काफ़ी उत्सुक रहते हैं."
जब शुभांकर के दोस्तों को पता चला कि ये क्रिकेट देखने के लिए ब्रिटेन जा रहे हैं तो वो ये जानकर हैरान हुए थे.
शुभांकर के पास साझा करने के लिए एक अनोखी कहानी है. इनको स्कूल में एक प्रोजेक्ट मिला था जिसमें इन्हें अपने पसंदीदा खिलाड़ी को एक ख़त लिखना था. तब इन्होंने शेन वॉर्न को ख़त लिखा था और शेन वॉर्न ने इनके ख़त का जवाब भी दिया था.
क्रिकेट प्रेम की इस दौड़ में शुभांकर के भाई गौतम भी पीछे नहीं हैं. उनके अनुसार अभी चल रहे विश्व कप में भारत के भीतर इतनी क्षमता है कि वे सेमी-फाइनल या फाइनल में अपनी जगह बना लेगा.
अभंग बहुत कम मौक़ों पर भारत जाते हैं. क्रिकेट के लिए उनका प्यार इतना ज़्यादा है कि आख़िरी बार वो आईपीएल देखने के लिए ही भारत गए थे.
अभंग बताते हैं, "क्रिकेट एनआरआई परिवारों को भारत से जोड़ने का एक अच्छा माध्यम है. संगीत और सिनेमा भी है पर वहां भाषा की बाधा हो जाती है. लेकिन क्रिकेट सभी भाषाओं के लिए है और सभी देश और संस्कृतियों के लिए है."
"मैं सचिन तेंदुलकर को देखते हुए बड़ा हुआ. मुझे उनके पहले और आख़िरी मैच के साथ-साथ सभी रिकॉर्ड्स याद हैं. ऐसा ही कुछ रिश्ता मेरे बच्चों का विराट कोहली के साथ है. इस पर कई बार हमारी बहस होती है. लेकिन क्रिकेट के लिए हमारा प्यार और जुनून हमेशा इसी तरह बना रहेगा."
अगर अभंग का परिवार विश्व कप देखने के लिए दुनिया के पश्चिमी हिस्से से आया था तो विवेक का परिवार भी दुनिया के पूर्वी हिस्से से विश्व कप का मज़ा लेने आया था.
विवेक मूल रूप से तमिल हैं लेकिन पिछले दो दशकों से सिंगापुर में रह रहे हैं. इनके पिता सुदर्शन 25 साल पहले सिंगापुर गए थे जिसके बाद इनका पूरा परिवार वहीं बस गया.
विवेक का सात सदस्यों वाला परिवार विश्व कप देखने के लिए ब्रिटेन आया है.
विवेक बताते हैं, "हम पूरा टूर्नामेंट देखना चाहते थे लेकिन सिंगापुर में हमारी एक कंपनी है जिसके कारण हमें 10-15 दिनों के अंदर ही वापस जाना होगा. पैसे की इतनी दिक्क़त नहीं है लेकिन कंपनी और बच्चों का स्कूल ज़रूरी है."
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